बात 19वीं सदी की है, जब अफगानी किसी भी तरह से भारतीय सरजमीं पर अपनी बाहशाहत कायम करना चाहते थे. तब भारत ब्रिटिशों के अधीन था. अफगानियों और ब्रिटिश हुकूमत के बीच जंग होती रहती थी. सितंबर 1897 में अफगानियों ने प्लान बनाया कि वो सारागढ़ी (जो कि अब पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में है) के रास्ते भारत पर हमला करेंगे. 1 ही दिन में सारागढ़ी किला फिर उसके बाद गुलिस्तान किला और अंत में लोकहार्ट किले पर फतह करेंगे. लेकिन गुलिस्तान किले में तैनात 21 सिख सैनिकों ने अफगानियों को करारी टक्कर दी. गुलिस्तान किले में हवलदार इशर सिंह (अक्षय कुमार) के नेतृत्व में कैसे 21 सैनिकों ने अफगानियों से लोहा मांगा, ये देखने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी.
अक्षय कुमार उन एक्टर्स में शुमार हैं जो हर रोल में फिट हो जाते हैं. केसरी में अक्षय कुमार ने एक बार फिर अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया है. सिख सैनिक के रोल में उन्होंने शानदार काम किया है. चाहे वो कॉमिक सीन हो, इमोशनल हो या एक्शन, अक्षय हर फ्रेम में जमे हैं. क्लाइमेक्स के एक्शन सीन्स में अक्षय कुमार ने जिस तरह से सैकड़ों अफगानियों को पटखनी दी है, वो काबिल-ए तारीफ है. ऐसा लगा मानो वो रोल कर नहीं रहे उसे जी रहे हों. परिणीति चोपड़ा के सीन्स बेहद कम हैं. वे सिर्फ अक्षय कुमार के ख्यालों में आती-जाती रही हैं. फिल्म के बाकी कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है.
केसरी को देखे जाने की कई वजहें हैं. मूवी का कंटेंट सबसे ठोस है. भारत में इतिहास के पन्नों में कहीं दफन सारागढ़ी की लड़ाई के बारे में जानने के लिए इस फिल्म से बेहतर और कुछ नहीं. केसरी कई मौकों पर हंसाती है, रुलाती है और फक्र भी महसूस कराती है. केसरी कंप्लीट एंटरटेनर फिल्म है. ये फिल्म भारतीय खासतौर पर सिख होने पर गर्व कराती है. बैकग्राउंड स्कोर समेत फिल्म के गाने कनेक्ट करने में कामयाब हुए हैं. आखिरी सॉन्ग तेरी मिट्टी इमोशनल करता है. क्लाइमेक्स के फाइट सीन्स रौंगटे खड़े करते हैं. अनुराग सिंह ने कमाल का डायरेक्शन किया है. उन्होंने कहीं भी कहानी को भटकने नहीं दिया. मूवी स्टार्ट टू फिनिश बांधे रखती है. लोकेशन सूट कमाल का है. कुल मिलाकर केसरी पॉवरफुल फिल्म है जिसे जरूर देखना चाहिए
भारतीय जनता पार्टी लंबे इंतजार और मैराथन मंथन के बाद लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर सकती है. होली के जश्न के बीच आज दोपहर बाद टिकटों की घोषणा संभव मानी जा रही है. बताया जा रहा है कि बीजेपी ने 250 उम्मीदवारों के नाम फाइनल कर लिए हैं. पहली लिस्ट में यूपी के करीब 35 उम्मीदवारों के नामों की घोषण हो सकती है.
इससे पहले बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत दोनों डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और केशव मौर्य व प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय भी मौजूद रहे. इस मंथन के बाद यह बात सामने आ रही है कि रामपुर लोकसभा सीट से बीजेपी जया प्रदा को उतार सकती है.
साथ ही बिहार की सभी 17 सीटों के लिए भी बीजेपी उम्मीदवारों की घोषणा आज कर सकती है. जबकि महाराष्ट्र की 21 सीटों पर भी फैसला हो सकता है.
बंगाल के उम्मीदवारों के चयन को लेकर भी बीजेपी की बैठक हुई है. बताया जा रहा है कि कुल 42 में से 27 सीटों के उम्मीदवारों के नाम फाइनल हो गए हैं. सूत्रों के मुताबिक आसनसोल से बाबुल सुप्रियो चुनाव लड़ेंगे, जबकि दार्जिलिंग से एसएस अहलुवालिया को टिकट मिल सकता है. TMC से बीजेपी में शामिल हुए सौमित्र खान को भी टिकट मिल सकता है. इसके अलावा अनुपम हजारा को भी मौका मिलने की उम्मीद है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में बीजेपी केंद्रीय चुनाव समिति की बुधवार को दिल्ली में हुई बैठक में छत्तीसगढ़ की 11 में से 5 सीटों के उम्मीदवारों के नाम भी तय कर लिए गए. छ्त्तीसगढ़ की बाकी सीटों पर 22 मार्च को फैसला हो सकता है.
Thursday, March 21, 2019
Thursday, March 7, 2019
बालाकोट हमले पर भरोसे को लेकर उठते ये सवाल
पुलवामा में चरमपंथी हमले और उसके बाद की घटनाओं पर विपक्षी दलों की आवाज़ भले ही दबी-दबी सी रही हो लेकिन बहुजनों में इस पर कई सवाल सुने जा सकते हैं.
दिल्ली के कीर्ति नगर के अवधेश कुमार पाकिस्तान पर भारतीय कार्रवाई को "झूठा, झूठा, झूठा" बताते हैं तो वहीं फुटपाथ के पास काले रंग की मोटरसाइकल पर बैठे जितेंद्र पिप्पल सरकारी दावे को फर्ज़ी क़रार देने में रत्ती भर भी नहीं हिचकते.
"पाकिस्तान को कुछ सबक़ नहीं सिखाया, कोई सबक़ नहीं सिखाया जनाब," 30-35 साल के दिहाड़ी मज़दूर अवधेश कुमार पाकिस्तान को घर में घुसकर सबक़ सिखाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावे पर कहते हैं.
अवधेश कुमार, जितेंद्र पिप्पल और उनके दूसरे कई साथी मंगलवार को दिल्ली में आरक्षण, दलितों, मुसलमानों पर लगातार हो रहे कथित हमलों और आदिवासियों को जंगल से बेदख़ल करने की कथित कोशिशों के ख़िलाफ़ हुई रैली का हिस्सा थे.
कई लोगों की राय है कि एक जब नेता और मीडिया भारत-पाकिस्तान तनाव और दोनों तरफ़ के दावों-प्रतिदावों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, दलितों और आदिवासियों की तरफ़ से रोज़गार, जल, जंगल और ज़मीन जैसे मुद्दे का उठना इस बात को इंगित करता है कि पूरा देश युद्धोन्माद में नहीं फंसा है.
हालांकि, बहुजनों के इस कार्यक्रम को कुछ सियासी जमातों जैसे राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी का सर्मथन भी हासिल था लेकिन रैलियों में शामिल अधिकांश लोग सामाजिक संगठनों की कोशिशों या प्रभाव की वजह से आए थे.
"जहां एक पिन लेकर आदमी नहीं जा सकता वहां 250 किलो आरडीएक्स कहां से आ गया? किसकी शह पर आ गया? कौन लेकर आया? और उसको कैसे पता था कि यही गाड़ी बिना बुलेट-प्रूफ़ है और इसी से टकराना है?" दलित कार्यकर्ता बीएस आज़ाद एक ही सांस में सवालों की झड़ी लगा देते हैं.
ये कुछ उसी किस्म के सवाल हैं जैसे कांग्रेस महासचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने भी उठाए हैं और जिसकी वजह से वो भारतीय जनता पार्टी नेताओं, उसके समर्थकों और मीडिया के एक वर्ग के निशाने पर हैं.
पूर्व सेनाध्यक्ष और नरेंद्र मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने ट्वीट कर लिखा, "रात 3.30 बजे मच्छर बहुत थे, तो मैंने HIT मारा. अब मच्छर कितने मारे, ये गिनने बैठूँ, या आराम से सो जाऊँ?"
वीके सिंह का ये व्यंग्यात्मक जुमला शायद उन विपक्षी नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए था जिन्होंने भारत की तरफ़ से पाकिस्तान के बालाकोट पर किए हमले में मारे गए लोगों की तादाद पर सरकार से जुड़े लोगों के बदलते बयानों को लेकर सवाल उठाए हैं.
मगर वीके सिंह और मोदी सरकार के दूसरे मंत्रियों के लिए जितेंद्र, आज़ाद, अवधेश, संजीव और उन जैसे बहुजन समाज (राजनीतिक दल नहीं) से जुड़े लोगों के सवालों को हवा में उड़ा देना इतना आसान नहीं होगा.
मंगलवार की रैली के पहले ही केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर का आनन-फ़ानन में बयान आया कि वो दो दिनों में शिक्षण संस्थानों और यूनिवर्सिटियों की नौकरियों में आरक्षण के लिए लागू किए गए नए 13 प्वांइट रोस्टर में बदलाव करने जा रहे हैं.
नए फ़ार्मूले में विश्वविद्यालय या संस्था के बजाय आरक्षण का आधार डिपार्टमेंट्स को मान लिया गया है. चूंकि किसी विभाग की निकलने वाली नौकरियों की तादाद कम होती है, ऐसे में उसमें रिज़र्वेशन लागू करने का चांस ही ख़त्म सा हो गया है.
ख़बर है कि सरकार 13 पॉइंट रोस्टर में बदलाव के लिए अध्यादेश ला सकती है.
ये पहली बार नहीं है कि बहुजन समाज की ओर से हुए विरोध के बाद मोदी सरकार ने पीछे हटकर उनकी मांगों को माना है.
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी उत्पीड़न क़ानून में बदलाव कर दिया था जिसके बाद दो अप्रैल को देश भर में व्यापक आंदोलन हुआ था. इसके बाद सरकार ने इस मामले पर नया क़ानून लाकर अदालत के फ़ैसले को पलट दिया था.
जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में हिंदी की प्रोफ़ेसर हेमलता माहेश्वर पूछती हैं, "प्रोटेस्ट की बात सुनकर क्यों फ़ैसला किया जाता है? क्या सरकार में इस तरह की जनतांत्रिक चेतना नहीं है कि वो लोगों की परेशानियों को पहले ही देख-समझ ले? सरकार का मतलब सिर्फ़ अंबानी-अडाणी हैं या सरकार का मतलब है- देश में रहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति?"
दिल्ली के कीर्ति नगर के अवधेश कुमार पाकिस्तान पर भारतीय कार्रवाई को "झूठा, झूठा, झूठा" बताते हैं तो वहीं फुटपाथ के पास काले रंग की मोटरसाइकल पर बैठे जितेंद्र पिप्पल सरकारी दावे को फर्ज़ी क़रार देने में रत्ती भर भी नहीं हिचकते.
"पाकिस्तान को कुछ सबक़ नहीं सिखाया, कोई सबक़ नहीं सिखाया जनाब," 30-35 साल के दिहाड़ी मज़दूर अवधेश कुमार पाकिस्तान को घर में घुसकर सबक़ सिखाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावे पर कहते हैं.
अवधेश कुमार, जितेंद्र पिप्पल और उनके दूसरे कई साथी मंगलवार को दिल्ली में आरक्षण, दलितों, मुसलमानों पर लगातार हो रहे कथित हमलों और आदिवासियों को जंगल से बेदख़ल करने की कथित कोशिशों के ख़िलाफ़ हुई रैली का हिस्सा थे.
कई लोगों की राय है कि एक जब नेता और मीडिया भारत-पाकिस्तान तनाव और दोनों तरफ़ के दावों-प्रतिदावों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, दलितों और आदिवासियों की तरफ़ से रोज़गार, जल, जंगल और ज़मीन जैसे मुद्दे का उठना इस बात को इंगित करता है कि पूरा देश युद्धोन्माद में नहीं फंसा है.
हालांकि, बहुजनों के इस कार्यक्रम को कुछ सियासी जमातों जैसे राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी का सर्मथन भी हासिल था लेकिन रैलियों में शामिल अधिकांश लोग सामाजिक संगठनों की कोशिशों या प्रभाव की वजह से आए थे.
"जहां एक पिन लेकर आदमी नहीं जा सकता वहां 250 किलो आरडीएक्स कहां से आ गया? किसकी शह पर आ गया? कौन लेकर आया? और उसको कैसे पता था कि यही गाड़ी बिना बुलेट-प्रूफ़ है और इसी से टकराना है?" दलित कार्यकर्ता बीएस आज़ाद एक ही सांस में सवालों की झड़ी लगा देते हैं.
ये कुछ उसी किस्म के सवाल हैं जैसे कांग्रेस महासचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने भी उठाए हैं और जिसकी वजह से वो भारतीय जनता पार्टी नेताओं, उसके समर्थकों और मीडिया के एक वर्ग के निशाने पर हैं.
पूर्व सेनाध्यक्ष और नरेंद्र मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने ट्वीट कर लिखा, "रात 3.30 बजे मच्छर बहुत थे, तो मैंने HIT मारा. अब मच्छर कितने मारे, ये गिनने बैठूँ, या आराम से सो जाऊँ?"
वीके सिंह का ये व्यंग्यात्मक जुमला शायद उन विपक्षी नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए था जिन्होंने भारत की तरफ़ से पाकिस्तान के बालाकोट पर किए हमले में मारे गए लोगों की तादाद पर सरकार से जुड़े लोगों के बदलते बयानों को लेकर सवाल उठाए हैं.
मगर वीके सिंह और मोदी सरकार के दूसरे मंत्रियों के लिए जितेंद्र, आज़ाद, अवधेश, संजीव और उन जैसे बहुजन समाज (राजनीतिक दल नहीं) से जुड़े लोगों के सवालों को हवा में उड़ा देना इतना आसान नहीं होगा.
मंगलवार की रैली के पहले ही केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर का आनन-फ़ानन में बयान आया कि वो दो दिनों में शिक्षण संस्थानों और यूनिवर्सिटियों की नौकरियों में आरक्षण के लिए लागू किए गए नए 13 प्वांइट रोस्टर में बदलाव करने जा रहे हैं.
नए फ़ार्मूले में विश्वविद्यालय या संस्था के बजाय आरक्षण का आधार डिपार्टमेंट्स को मान लिया गया है. चूंकि किसी विभाग की निकलने वाली नौकरियों की तादाद कम होती है, ऐसे में उसमें रिज़र्वेशन लागू करने का चांस ही ख़त्म सा हो गया है.
ख़बर है कि सरकार 13 पॉइंट रोस्टर में बदलाव के लिए अध्यादेश ला सकती है.
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पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी उत्पीड़न क़ानून में बदलाव कर दिया था जिसके बाद दो अप्रैल को देश भर में व्यापक आंदोलन हुआ था. इसके बाद सरकार ने इस मामले पर नया क़ानून लाकर अदालत के फ़ैसले को पलट दिया था.
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