Friday, December 21, 2018

नसीरुद्दीन शाह का पुतला फूंका, कार से नहीं उतर सके

अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का अजमेर के पांचवे लिटरेचर फेस्टिवल में जमकर विरोध हुआ. वो फेस्टिवल का शुभारंभ नहीं कर पाए. काफी देर तक लिटरेचर फेस्टिवल के बाहर वह अपनी गाड़ी में बैठे रहे और फिर वापस होटल आ गए. उनके लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने को लेकर कुछ संगठनों ने जबरदस्त हंगामा मचाया. सारे बैनर, पोस्टर फाड़ दिए और फेस्टिवल के मंच पर चढ़कर भी तहस-नहस की. मौके पर पहुंची पुलिस ने मामला शांत करना चाहा लेकिन कार्यकर्ता लगातर नारेबाजी करते रहे. वहीं बढ़ते विरोध को देखते हुए नसीरुद्दीन ने कार्यक्रम में आने का फैसला टाल दिया .

दरअसल, नसीरुद्दीन शाह ने गुरुवार को एक वीडियो जारी किया था. इस वीडियो में उन्होंने कहा था, 'समाज में जहर फैला हुआ है. मुझे मेरे बच्चों को लेकर चिंता होती है. अगर कभी भीड़ ने घेर कर उन्हें पूछ लिया कि तुम हिंदू हो या मुस्लिम तो वो इसका जवाब नहीं दे पाएंगे. देश में किसी पुलिसवाले की मौत से ज्यादा अहम गाय की मौत है. इसी कारण अजमेर में नसीरुद्दीन शाह के आने की खबर के बाद से ही उनका विरोध किया जा रहा है.

बीजेपी युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम स्थल के बाहर उनका पुतला फूंककर जबरदस्त विरोध किया और नसीरुद्दीन को पाकिस्तान जाने की सलाह दी. तो कई राजनीतिक दलों ने शा​​ह के बयान को देशविरोधी करार दिया है. कुछ उनके बयान को पाकिस्तान परस्ती से जोडकर देख रहे हैं.

बता दें कि इससे पहले नसीरुद्दीन शाह अजमेर में बचपन के अपने स्कूल सेंट असलम पहुंचे और वहां काफी देर तक वक्त बिताया. वहां पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'मैंने जो बयान दिया वो एक चिंतित हिंदुस्तानी की हैसियत से दिया है. इससे पहले भी कई बार वो इस बात को दोहरा चुके हैं. अपने डर को लेकर मेरा यह बयान पहली बार नहीं है.'

अपने बयान को लेकर चल रही सियासत पर शाह का कहना था कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि आखिर बयान पर इतना विवाद क्यों हो रहा है. कांग्रेस द्वारा बयान के समर्थन और बीजेपी द्वारा बयान के विरोध पर उनका कहना था की दोनों अपना काम कर रहे हैं.

गौरतलब है कि 3 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में कथित गोकशी के बाद हिंसा भड़क गई थी. हिंसा के दौरान किसी ने इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को गोली मार दी, जिससे उनकी मौत हो गई. इसी के चलते शाह ने गुरुवार को वीडियो जारी कर बयान दिया था.

केंद्र और भूमि विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) ने अदालत को बताया कि पुन:प्रवेश का नोटिस जब जारी किया गया था जब उसने 2016 में कार्यवाही शुरू की थी जब कोई मुद्रण या प्रकाशन की गतिविधि नहीं हो रही थी.

इस मामले में एक पीड़िता निरप्रीत कौर ने फ़ैसले के बाद कहा, "मैं जज साहब की शुक्रगुज़ार हूँ. और उस पूरी टीम का धन्यावाद करती हूं कि जिसने ये केस लड़ा. काश ! ये पहले हो जाता तो मेरी इतनी दुर्गति नहीं होती. जो मैंने खोया, वो मैं खोती नहीं. मैं उम्रक़ैद की सज़ा से संतुष्ट हूँ. फांसी की सजा में वो एक बार लटक कर मर जाता लेकिन अब तड़प-तड़प कर मरेगा."

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सिख दंगों का पाप कांग्रेस पार्टी से कभी नहीं हट सकता, अब तो उनको सज़ा होनी चाहिए जिन्होंने भीड़ को दंगों के लिए उकसाया था.

जेटली ने कहा, "हम इस फ़ैसले का स्वागत करते हैं. 1984 में सिख दंगों में कांग्रेस नेता दंगाई भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. कांग्रेस के शासन में जाँच आयोग बिठाए, उसमें कांग्रेस नेताओं को छोड़ दिया गया. पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में नानावटी आयोग बनाया. इस आयोग ने पुलिस थानों के हिसाब से रिपोर्ट तैयार की. फिर 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने एसआईटी बनाई."

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